अंदरखाने । हिंदुस्तान दृष्टि । सूचना का अधिकार अधिनियम 2005 को देश में इसलिए लागू किया गया था ताकि शासन-प्रशासन की कार्यप्रणाली पारदर्शी बने, आम नागरिक यह जान सके कि सरकारी योजनाओं में पैसा कैसे खर्च हो रहा है और जिनके नाम पर योजनाएं बनाई जाती हैं, उन्हें उनका वास्तविक लाभ मिल भी रहा है या नहीं। लेकिन जमीनी हकीकत कई बार इस कानून की आत्मा पर ही सवाल खड़े कर देती है। ऐसा ही एक गंभीर मामला अनुसूचित जाति एवं आदिम जाति विकास विभाग से जुड़ा सामने आया है, जहां महीनों बीत जाने के बाद भी प्रथम अपील आदेश के बावजूद आज तक जानकारी उपलब्ध नहीं कराई गई है। यह न सिर्फ आरटीआई कानून का खुला उल्लंघन है, बल्कि यह भी संकेत देता है कि कहीं न कहीं कुछ ऐसा है, जिसे छुपाने की कोशिश की जा रही है।
आरटीआई आवेदन से शुरू हुई पारदर्शिता की मांग
पूरा मामला तब शुरू हुआ जब आदिम जाति विकास विभाग से संबंधित कुछ योजनाओं, खर्चों, लाभार्थियों और क्रियान्वयन की स्थिति को लेकर सूचना का अधिकार अधिनियम के तहत आवेदन किया गया। आवेदन में स्पष्ट रूप से बिंदुवार जानकारी मांगी गई थी, जो पूरी तरह सार्वजनिक हित से जुड़ी थी। यह कोई गोपनीय या राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा विषय नहीं था, बल्कि आदिवासी समाज के विकास के लिए बनाए गए कार्यक्रमों की वास्तविक स्थिति जानने का प्रयास था।
आरटीआई कानून के अनुसार किसी भी विभाग को 30 दिनों के भीतर मांगी गई जानकारी उपलब्ध कराना अनिवार्य है। यदि किसी कारणवश जानकारी नहीं दी जा सकती, तो उसका ठोस कारण लिखित रूप में बताना भी जरूरी है। लेकिन इस मामले में न तो समय पर जानकारी दी गई और न ही कोई संतोषजनक जवाब।
प्रथम अपील आदेश की भी अनदेखी
जब तय समय सीमा में जानकारी नहीं मिली, तो नियमानुसार प्रथम अपील दायर की गई। प्रथम अपीलीय अधिकारी ने मामले को गंभीर मानते हुए स्पष्ट आदेश दिया कि संबंधित लोक सूचना अधिकारी (PIO) तय समय के भीतर मांगी गई जानकारी उपलब्ध कराएं। प्रथम अपील आदेश किसी भी विभाग के लिए बाध्यकारी होता है और इसका पालन न करना कानूनन अपराध की श्रेणी में आता है।
इसके बावजूद, आदेश जारी हुए कई महीने बीत चुके हैं, लेकिन आज तक आदिम जाति विकास विभाग की ओर से कोई जानकारी नहीं दी गई। न कोई पत्र, न कोई स्पष्टीकरण, और न ही किसी प्रकार का औपचारिक जवाब। यह स्थिति यह सोचने पर मजबूर करती है कि आखिर विभाग किस दबाव में है या किस वजह से सूचना देने से बच रहा है।
क्या छुपाया जा रहा है?
सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब सूचना सार्वजनिक हित से जुड़ी है और प्रथम अपील आदेश भी हो चुका है, तो फिर जानकारी देने में इतनी हिचक क्यों? क्या विभाग के पास देने के लिए जानकारी ही नहीं है, या फिर जो जानकारी है, वह इतनी असहज सच्चाई उजागर कर देगी कि उसे सामने लाने से बचा जा रहा है? आदिम जाति विकास विभाग का दायित्व आदिवासी समाज के शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, आवास और सामाजिक-आर्थिक उत्थान से जुड़ा होता है। इस विभाग के माध्यम से करोड़ों रुपये की योजनाएं संचालित होती हैं। यदि इन योजनाओं में कहीं गड़बड़ी, अनियमितता, फर्जीवाड़ा या भ्रष्टाचार हुआ है, तो उसका उजागर होना कई अधिकारियों और जिम्मेदार लोगों के लिए मुश्किल खड़ी कर सकता है।
अनुसूचित जाति एवं आदिवासी समाज के हक पर सवाल
सूचना न देने का सबसे बड़ा नुकसान अनुसूचित जाति एवं आदिवासी समाज को हो रहा है। जिन योजनाओं का उद्देश्य उनके जीवन स्तर को बेहतर बनाना है, यदि उन्हीं योजनाओं की जानकारी छुपाई जा रही है, तो यह सीधे-सीधे उनके अधिकारों पर हमला है। पारदर्शिता के बिना विकास सिर्फ कागजों तक सीमित रह जाता है।
अनुसूचित जाति, आदिवासी क्षेत्रों में अक्सर यह शिकायत सुनने को मिलती है कि योजनाएं तो मंजूर हो जाती हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर उनका लाभ नहीं मिलता। कहीं छात्रावास अधूरे हैं, कहीं छात्रवृत्ति समय पर नहीं मिलती, कहीं आवास योजनाओं में पात्र लोगों के नाम गायब हैं। यदि इन सबकी जानकारी सार्वजनिक हो, तो जवाबदेही तय की जा सकती है।
आरटीआई कानून का मजाक
यह पहला मामला नहीं है जब किसी विभाग ने आरटीआई और प्रथम अपील आदेश को नजरअंदाज किया हो, लेकिन आदिम जाति विकास विभाग जैसे संवेदनशील विभाग द्वारा ऐसा किया जाना बेहद गंभीर है। आरटीआई कानून का उद्देश्य केवल सूचना देना नहीं, बल्कि प्रशासन में जवाबदेही और पारदर्शिता लाना है। जब विभाग खुलेआम आदेशों की अनदेखी करते हैं, तो यह कानून का मजाक उड़ाने जैसा है।
कानून में स्पष्ट प्रावधान है कि यदि लोक सूचना अधिकारी बिना उचित कारण के जानकारी नहीं देता, तो उस पर प्रतिदिन के हिसाब से जुर्माना लगाया जा सकता है। इसके बावजूद यदि कार्रवाई नहीं होती, तो यह भी सवाल उठाता है कि क्या निगरानी तंत्र वास्तव में सक्रिय है या सिर्फ औपचारिकता निभाई जा रही है।
प्रशासनिक चुप्पी और उसकी वजहें
विभाग की ओर से लगातार चुप्पी कई आशंकाओं को जन्म देती है। क्या विभाग के भीतर ही कोई निर्देश है कि इस मामले में जानकारी न दी जाए? क्या किसी उच्च अधिकारी या राजनीतिक दबाव के कारण मामला दबाया जा रहा है? या फिर फाइलें जानबूझकर रोकी जा रही हैं ताकि मामला ठंडे बस्ते में चला जाए?
अक्सर देखा गया है कि जब सूचना से किसी बड़े घोटाले या अनियमितता के उजागर होने की आशंका होती है, तो विभाग समय खींचने की नीति अपनाते हैं। कभी फाइल उपलब्ध नहीं होने का बहाना, कभी अधिकारी के ट्रांसफर का कारण, तो कभी तकनीकी त्रुटियों का हवाला दिया जाता है। लेकिन यहां तो प्रथम अपील आदेश के बाद भी पूर्ण चुप्पी है, जो और भी गंभीर संकेत देती है।
मीडिया और सामाजिक संगठनों की भूमिका
ऐसे मामलों में मीडिया और सामाजिक संगठनों की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण हो जाती है। यदि इस तरह की अनदेखी को उजागर नहीं किया गया, तो यह एक खतरनाक मिसाल बन सकती है। आज एक आरटीआई को नजरअंदाज किया गया, कल दर्जनों मामलों में ऐसा हो सकता है।
अनुसूचित जाति, आदिवासी अधिकारों के लिए काम करने वाले संगठनों का कहना है कि पारदर्शिता ही विकास की पहली शर्त है। यदि विभागों से जानकारी ही नहीं मिलेगी, तो यह कैसे तय होगा कि योजनाएं सही दिशा में चल रही हैं या नहीं।
जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही तय हो
सबसे अहम सवाल यह है कि इस पूरे मामले में जिम्मेदार कौन है? क्या केवल लोक सूचना अधिकारी, या फिर विभाग के उच्च अधिकारी भी इसके लिए उत्तरदायी हैं? प्रथम अपील आदेश का पालन न करना केवल प्रशासनिक लापरवाही नहीं, बल्कि कानून की अवहेलना है।
RTI कार्यकर्ताओं का मानना है कि ऐसे मामलों में संबंधित अधिकारियों पर तत्काल दंडात्मक कार्रवाई होनी चाहिए, ताकि भविष्य में कोई भी विभाग आरटीआई कानून को हल्के में न ले। यदि समय रहते सख्त कदम नहीं उठाए गए, तो सूचना का अधिकार केवल कागजों तक सिमट कर रह जाएगा।
आगे क्या?
अब जब महीनों बीत चुके हैं और जानकारी आज तक नहीं मिली, तो सवाल उठता है कि आगे की राह क्या है। कानून के अनुसार अब द्वितीय अपील या राज्य सूचना आयोग में शिकायत का रास्ता खुलता है। लेकिन यह प्रक्रिया भी समय लेने वाली होती है, और तब तक सच्चाई और भी पीछे धकेल दी जाती है। यह जरूरी है कि उच्च स्तर पर इस मामले को संज्ञान में लिया जाए और आदिम जाति विकास विभाग से यह स्पष्ट पूछा जाए कि आखिर सूचना क्यों रोकी जा रही है। यदि विभाग के पास छुपाने के लिए कुछ नहीं है, तो उसे तुरंत पूरी जानकारी सार्वजनिक करनी चाहिए।
महीनों बीत जाने के बाद भी प्रथम अपील आदेश के बावजूद जानकारी न देना न सिर्फ आरटीआई कानून का उल्लंघन है, बल्कि यह प्रशासनिक पारदर्शिता पर भी गंभीर सवाल खड़े करता है। आदिम जाति विकास विभाग जैसे महत्वपूर्ण और संवेदनशील विभाग से इस तरह की उम्मीद नहीं की जा सकती। यह मामला केवल एक आरटीआई आवेदन का नहीं, बल्कि अनुसूचित जाति, आदिवासी समाज के अधिकारों, सरकारी जवाबदेही और लोकतांत्रिक मूल्यों का है।
अब समय आ गया है कि इस चुप्पी को तोड़ा जाए, जिम्मेदारों से जवाब मांगा जाए और यह सुनिश्चित किया जाए कि सूचना का अधिकार केवल कानून की किताबों तक सीमित न रहे, बल्कि जमीनी स्तर पर भी पूरी मजबूती से लागू हो। क्योंकि जब तक सवाल पूछे जाएंगे और जवाब मिलेंगे, तभी सच्चे मायनों में लोकतंत्र मजबूत होगा।B
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