मुंगेली । हिंदुस्तान दृष्टि । छत्तीसगढ़ की राजनीति में सितंबर 2026 का यह घटनाक्रम मुंगेली विधानसभा की राजनीति के लिए खासा महत्वपूर्ण माना जा रहा है। भाजपा सरकार में मंत्री गुरु खुशवंत साहेब के बड़े भाई और सतनामी समाज से जुड़े गुरु ढालदास साहेब ने कांग्रेस का दामन थाम लिया है। पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल की मौजूदगी में कांग्रेस में शामिल होने के बाद ढालदास साहेब ने आगामी विधानसभा चुनाव लड़ने की इच्छा भी जाहिर की है और उनकी पहली पसंद के तौर पर मुंगेली विधानसभा क्षेत्र का नाम सामने आया है। ढालदास साहेब का कांग्रेस में प्रवेश इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यह केवल एक नेता के दल बदलने की घटना नहीं है, बल्कि इसके साथ सतनामी समाज, मुंगेली विधानसभा की सामाजिक संरचना, भाजपा की मौजूदा राजनीतिक पकड़ और कांग्रेस की संभावित रणनीति जैसे कई सवाल एक साथ जुड़ गए हैं। हालांकि अभी 2028 विधानसभा चुनाव में काफी समय बाकी है और कांग्रेस ने मुंगेली से किसी प्रत्याशी के नाम की घोषणा नहीं की है। इसलिए ढालदास साहेब को अभी से कांग्रेस का उम्मीदवार मान लेना जल्दबाजी होगी। लेकिन उन्होंने स्वयं चुनाव लड़ने की इच्छा जाहिर कर दी है, ऐसे में मुंगेली की राजनीति में उनके प्रवेश को संभावित दावेदारी के रूप में जरूर देखा जा रहा है।
सबसे बड़ा सवाल क्या ढालदास साहेब मुंगेली से कांग्रेस का चेहरा बनेंगे?
ढालदास साहेब ने कांग्रेस में शामिल होने के बाद स्पष्ट रूप से कहा है कि यदि पार्टी उन्हें मौका देती है तो वे विधानसभा चुनाव लड़ना चाहते हैं। उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार उनकी प्राथमिकता मुंगेली विधानसभा है। साथ ही उन्होंने यह भी स्पष्ट किया है कि वे अपने छोटे भाई और भाजपा सरकार में मंत्री गुरु खुशवंत साहेब के खिलाफ चुनाव लड़ने पड़े तो पीछे नहीं हटेंगे । यानी आरंग सीट को लेकर उनका रुख भाई के राजनीतिक भविष्य से जुड़ा हुआ है, जबकि मुंगेली को उन्होंने अपनी प्राथमिक पसंद बताया है।
यही बात मुंगेली की राजनीति में इस पूरे घटनाक्रम को ज्यादा महत्वपूर्ण बनाती है।
क्योंकि मुंगेली विधानसभा अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित सीट है और यहां लंबे समय से भाजपा तथा कांग्रेस के बीच सीधा मुकाबला देखने को मिलता रहा है। 2023 के विधानसभा चुनाव में भाजपा के पुन्नूलाल मोहले ने कांग्रेस के संजीत बनर्जी को हराया था। चुनाव परिणाम के अनुसार मोहले को 85,429 वोट मिले, जबकि कांग्रेस प्रत्याशी को 73,648 वोट मिले। यानी भाजपा की जीत का अंतर करीब 11,781 वोट रहा। यह आंकड़ा कांग्रेस के लिए सबसे महत्वपूर्ण संकेत है। पार्टी को यदि 2028 में मुंगेली की सीट भाजपा से छीननी है तो केवल प्रत्याशी बदलना पर्याप्त नहीं होगा, बल्कि उसे पिछले चुनाव के लगभग 12 हजार वोट के अंतर को पाटने के लिए मजबूत सामाजिक और राजनीतिक गठजोड़ तैयार करना होगा। यहीं पर ढालदास साहेब की दावेदारी का महत्व सामने आता है।
मुंगेली में भाजपा की पकड़ क्यों मजबूत है?
मुंगेली विधानसभा में भाजपा का राजनीतिक आधार नया नहीं है। पुन्नूलाल मोहले लंबे समय से इस क्षेत्र की राजनीति में भाजपा का प्रमुख चेहरा रहे हैं। चुनावी आंकड़ों में 2013 में भी पुन्नूलाल मोहले की जीत हुआ है। 2023 में भी भाजपा ने इस सीट पर अपनी पकड़ बरकरार रखी और पुन्नूलाल मोहले ने कांग्रेस प्रत्याशी को लगभग 11.8 हजार वोटों से पीछे छोड़ दिया। इसका अर्थ यह नहीं है कि मुंगेली भाजपा के लिए हमेशा एकतरफा सीट रही है। चुनाव में स्थानीय प्रत्याशी, संगठन, सरकार के प्रति मतदाताओं की नाराजगी, सामाजिक समीकरण और चुनावी मुद्दे परिणाम को प्रभावित करते हैं।
लेकिन पिछले चुनाव का परिणाम कांग्रेस के सामने एक स्पष्ट चुनौती रखता है उसे भाजपा के मजबूत संगठन और मोहले के व्यक्तिगत राजनीतिक आधार दोनों का सामना करना होगा।
अब यदि कांग्रेस ढालदास साहेब जैसे सामाजिक प्रभाव वाले चेहरे को मैदान में उतारती है तो मुकाबले की प्रकृति बदल सकती है।
सतनामी समाज का समीकरण कितना महत्वपूर्ण?
मुंगेली की राजनीति में सतनामी समाज को नजरअंदाज करके चुनावी गणित समझना मुश्किल है। सतनामी समाज छत्तीसगढ़ की राजनीति में प्रभावशाली सामाजिक समूहों में माना जाता है और गुरु घासीदास की परंपरा से जुड़ा सामाजिक-धार्मिक प्रभाव मुंगेली सहित बिलासपुर संभाग के कई क्षेत्रों में दिखाई देता है। ढालदास साहेब इसी सामाजिक-धार्मिक पृष्ठभूमि से आते हैं। सतनामी समाज से जुड़े प्रमुख नेता है। वे गुरु बालदास साहेब के बड़े बेटे हैं और भाजपा सरकार के मंत्री गुरु खुशवंत साहेब के बड़े भाई हैं।
इसलिए कांग्रेस के लिए उनकी एंट्री का पहला संभावित लाभ सतनामी मतदाताओं के बीच नया संदेश हो सकता है। लेकिन यहां एक महत्वपूर्ण राजनीतिक सावधानी भी है।
किसी भी विधानसभा क्षेत्र में पूरा चुनाव केवल एक जाति या समाज के आधार पर नहीं जीता जा सकता। ढालदास साहेब यदि मुंगेली से चुनाव लड़ते हैं तो उन्हें सतनामी समाज के साथ-साथ अन्य अनुसूचित जाति वर्गों, ओबीसी, सामान्य वर्ग, ग्रामीण मतदाताओं, शहरी मतदाताओं, युवा, महिला और किसान मतदाताओं तक अपनी स्वीकार्यता बनानी होगी।
यानी उनके सामने असली चुनौती होगी
सामाजिक प्रभाव को चुनावी वोट में कैसे बदला जाए?
भाजपा के लिए सबसे बड़ी चिंता क्या हो सकती है?
ढालदास साहेब के कांग्रेस में जाने को भाजपा के लिए तत्काल चुनावी नुकसान के रूप में देखना अभी जल्दबाजी होगी। लेकिन राजनीतिक दृष्टि से यह जरूर एक ऐसा घटनाक्रम है जिसे भाजपा नजरअंदाज नहीं कर सकती।
इसका कारण केवल ढालदास साहेब नहीं हैं।
इसके पीछे एक बड़ा राजनीतिक संदेश भी है।
एक तरफ गुरु खुशवंत साहेब भाजपा सरकार में मंत्री हैं और दूसरी तरफ उनके बड़े भाई ढालदास साहेब कांग्रेस में चले गए हैं। इससे छत्तीसगढ़ की राजनीति में परिवार के भीतर अलग-अलग राजनीतिक रास्तों का उदाहरण सामने आया है।
ढालदास साहेब ने खुद कहा है कि परिवार से अपने-अपने राजनीतिक रास्ते को लेकर चर्चा की है।
इसलिए इसे पारिवारिक राजनीतिक टकराव के रूप में देखना उचित नहीं होगा। लेकिन राजनीतिक नजरिए से देखें तो कांग्रेस को एक ऐसा चेहरा जरूर मिला है जिसके जरिए वह भाजपा के एक मंत्री के परिवार से जुड़े सामाजिक प्रभाव को अपने पक्ष में प्रस्तुत कर सकती है।
भाजपा के लिए चुनौती यह होगी कि वह इस घटनाक्रम को अपने संगठनात्मक आधार पर हावी न होने दे।
कांग्रेस के सामने टिकट का सवाल
ढालदास साहेब के कांग्रेस में आने के बाद सबसे बड़ा सवाल कांग्रेस के अंदर ही खड़ा होगा।
क्या कांग्रेस उन्हें मुंगेली से टिकट देगी?
यह फैसला आसान नहीं होगा।
क्योंकि मुंगेली में कांग्रेस के स्थानीय नेता और संभावित दावेदार लंबे समय से पार्टी के लिए काम कर रहे हैं। 2023 में कांग्रेस ने संजीत बनर्जी को मैदान में उतारा था और पार्टी को 73,648 वोट मिले थे। ऐसे में यदि कांग्रेस 2028 में बाहरी या नए राजनीतिक चेहरे के रूप में ढालदास साहेब को टिकट देती है तो पार्टी के भीतर टिकट की राजनीति स्वाभाविक रूप से तेज हो सकती है। दूसरी तरफ यदि कांग्रेस स्थानीय नेताओं में से किसी को टिकट देती है और ढालदास साहेब को संगठन में महत्वपूर्ण जिम्मेदारी देती है, तब भी उनके सामाजिक प्रभाव का उपयोग पार्टी व्यापक स्तर पर कर सकती है।
यानी कांग्रेस के पास दो रास्ते हैं
पहला ढालदास साहेब को सीधे चुनाव मैदान में उतारना।
दूसरा उन्हें संगठन और सामाजिक जनाधार मजबूत करने की जिम्मेदारी देना।
इन दोनों में से कौन सा रास्ता पार्टी अपनाती है, यह आने वाले समय में स्पष्ट होगा। क्या ढालदास साहेब कांग्रेस का वोट ट्रांसफर करा पाएंगे? यही सबसे महत्वपूर्ण सवाल है।
राजनीति में किसी बड़े सामाजिक या धार्मिक चेहरे की लोकप्रियता और चुनाव में मिलने वाले वोट हमेशा समान नहीं होते। किसी व्यक्ति का समाज में सम्मान होना अलग बात है और चुनाव में बूथ स्तर तक वोटरों को पार्टी के पक्ष में लामबंद करना अलग बात।
ढालदास साहेब के सामने भी यही चुनौती होगी।
उन्हें यदि कांग्रेस मुंगेली से मैदान में उतारती है तो उन्हें सबसे पहले अपने समर्थकों को कांग्रेस संगठन से जोड़ना होगा। उसके बाद बूथ स्तर पर टीम बनानी होगी। ग्रामीण क्षेत्रों में लगातार संपर्क करना होगा और कांग्रेस के पारंपरिक मतदाताओं के साथ-साथ ऐसे मतदाताओं तक पहुंचना होगा जो पिछले चुनाव में भाजपा के साथ गए थे।
यही कारण है कि 2028 के चुनाव में अभी से ढालदास साहेब की वास्तविक राजनीतिक क्षमता का आकलन करना कठिन है।
भाजपा के लिए पुन्नूलाल मोहले फैक्टर
मुंगेली की राजनीति में भाजपा के मौजूदा विधायक पुन्नूलाल मोहले का नाम सबसे महत्वपूर्ण है।
2023 में मोहले ने 85,429 वोट हासिल किए और कांग्रेस के संजीत बनर्जी को 73,648 वोट मिले।
इस परिणाम को देखें तो कांग्रेस के सामने सिर्फ नया उम्मीदवार खड़ा करने की चुनौती नहीं है। उसे भाजपा के मौजूदा वोट आधार को भी तोड़ना होगा।
यदि 2028 में भाजपा फिर मोहले को मैदान में उतारती है तो मुकाबला एक तरफ लंबे राजनीतिक अनुभव और दूसरी तरफ सामाजिक प्रभाव वाले नए चेहरे के बीच बन सकता है।
हालांकि 2028 तक परिस्थितियां बदल सकती हैं। भाजपा का उम्मीदवार कौन होगा, कांग्रेस किसे टिकट देगी, स्थानीय मुद्दे क्या होंगे और सरकार के प्रति जनता का मूड कैसा होगा इन सबका असर परिणाम पर पड़ेगा।
इसलिए अभी से यह कहना कि ढालदास साहेब के आने से भाजपा की सीट खतरे में आ गई है, राजनीतिक रूप से अतिशयोक्ति होगी। लेकिन यह कहना भी गलत नहीं होगा कि कांग्रेस ने मुंगेली की चुनावी बिसात पर एक नया मोहरा जरूर रख दिया है।
मुंगेली में तीसरा कोण भी महत्वपूर्ण
मुंगेली का चुनाव केवल भाजपा-कांग्रेस के बीच ही सीमित नहीं रहता। 2023 में बसपा प्रत्याशी को भी 2,705 वोट मिले थे और आम आदमी पार्टी के प्रत्याशी को भी वोट मिले थे। संख्या भले ही भाजपा और कांग्रेस की तुलना में काफी कम रही हो, लेकिन करीबी चुनाव में छोटे दलों और निर्दलीय उम्मीदवारों के वोट भी परिणाम को प्रभावित कर सकते हैं।
यदि 2028 में भाजपा और कांग्रेस के बीच मुकाबला कड़ा होता है तो छोटे दलों के उम्मीदवार किस सामाजिक वर्ग में सेंध लगाते हैं, यह भी महत्वपूर्ण होगा।
विशेषकर अनुसूचित जाति आरक्षित सीट होने के कारण दलित राजनीति का प्रभाव यहां हमेशा महत्वपूर्ण रहेगा।
ढालदास साहेब के लिए सबसे बड़ी चुनौती मुंगेली की जमीन
ढालदास साहेब की राजनीतिक पहचान केवल मुंगेली तक सीमित नहीं मानी जाती। उनका व्यापक सामाजिक परिचय है। लेकिन विधानसभा चुनाव पूरी तरह स्थानीय चुनाव भी होता है। मतदाता यह देखता है कि उम्मीदवार उसके क्षेत्र में कितना सक्रिय रहा है। उसने स्थानीय समस्याओं के लिए कितना काम किया? लोगों के बीच उसकी पहुंच कितनी है? गांवों में संगठन कितना मजबूत है? बूथ स्तर पर उसके कितने कार्यकर्ता हैं?
युवाओं और महिलाओं में उसकी स्वीकार्यता कितनी है?
और सबसे महत्वपूर्ण क्या मतदाता उसे अपना स्थानीय प्रतिनिधि मानता है? मुंगेली से चुनाव लड़ने की इच्छा जाहिर करने के बाद ढालदास साहेब के लिए यही असली राजनीतिक परीक्षा शुरू होगी। यदि वे अगले डेढ़-दो वर्षों में लगातार मुंगेली क्षेत्र में सक्रिय रहते हैं, कांग्रेस के स्थानीय कार्यकर्ताओं के साथ संवाद बनाते हैं और गांव-गांव जाकर अपनी राजनीतिक जमीन तैयार करते हैं तो उनकी दावेदारी मजबूत हो सकती है।
कांग्रेस के सामने गुटबाजी रोकने की चुनौती
कांग्रेस के लिए केवल ढालदास साहेब को टिकट देना ही पर्याप्त नहीं होगा। सबसे बड़ी चुनौती होगी स्थानीय कांग्रेस संगठन को एकजुट रखना।
यदि टिकट ढालदास साहेब को मिलता है तो पार्टी के पुराने दावेदारों और स्थानीय नेताओं को साथ रखना जरूरी होगा।
क्योंकि विधानसभा चुनाव में उम्मीदवार अकेले चुनाव नहीं जीतता। पूरा संगठन चुनाव लड़ता है। यदि टिकट वितरण के बाद पार्टी के अंदर नाराजगी रहती है और कार्यकर्ता निष्क्रिय होते हैं तो किसी भी बड़े सामाजिक चेहरे का लाभ सीमित हो सकता है। इसके विपरीत यदि कांग्रेस ढालदास साहेब को स्थानीय संगठन के साथ जोड़कर चलती है और टिकट के मुद्दे पर समय रहते सहमति बनाती है तो पार्टी भाजपा को मजबूत चुनौती दे सकती है।
भाजपा की रणनीति भी बदल सकती है
ढालदास साहेब के कांग्रेस में जाने के बाद भाजपा के लिए भी मुंगेली सहित सतनामी बहुल क्षेत्रों में संगठनात्मक सक्रियता बढ़ाना स्वाभाविक होगा।
भाजपा यह संदेश देने की कोशिश कर सकती है कि एक व्यक्ति के कांग्रेस में जाने से उसका सामाजिक आधार प्रभावित नहीं हुआ है। इसके साथ ही पार्टी स्थानीय नेताओं, सामाजिक संगठनों और जमीनी कार्यकर्ताओं को अधिक सक्रिय कर सकती है। मुंगेली में भाजपा का संगठन लंबे समय से चुनावी राजनीति में सक्रिय है। उपलब्ध जिला वेबसाइट पर भी चुनाव संबंधी सूचनाएं और विधानसभा से संबंधित प्रशासनिक जानकारी उपलब्ध है। इसलिए कांग्रेस के लिए भाजपा के संगठनात्मक नेटवर्क को चुनौती देना आसान नहीं होगा।
ढालदास साहेब के कांग्रेस में आने का एक और राजनीतिक संदेश
इस घटनाक्रम का प्रभाव केवल मुंगेली तक सीमित नहीं रह सकता। ढालदास साहेब के कांग्रेस में शामिल होने को राज्य की राजनीति में भाजपा के खिलाफ कांग्रेस द्वारा सामाजिक और राजनीतिक पुनर्संयोजन की कोशिश के रूप में देखा जा सकता है। पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने उनके कांग्रेस प्रवेश का स्वागत किया है। कांग्रेस के लिए यह इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि पार्टी 2023 के विधानसभा चुनाव में सत्ता से बाहर हो गई थी और 2028 में वापसी के लिए उसे मजबूत सामाजिक समीकरण तैयार करना होगा।
ऐसे में सतनामी समाज से जुड़े प्रभावशाली चेहरे का कांग्रेस में आना पार्टी के लिए राजनीतिक रूप से उपयोगी हो सकता है।
लेकिन इसका वास्तविक प्रभाव 2028 के चुनाव में ही दिखाई देगा।
क्या मुंगेली में 2028 का मुकाबला भाजपा बनाम ढालदास होगा?
अभी इसका जवाब नहीं दिया जा सकता।
क्योंकि तीन चीजें अभी स्पष्ट नहीं हैं।
पहली कांग्रेस का आधिकारिक प्रत्याशी कौन होगा?
दूसरी भाजपा किसे मैदान में उतारेगी?
तीसरी 2028 में स्थानीय राजनीतिक परिस्थितियां कैसी होंगी? फिर भी मौजूदा परिस्थितियों को देखते हुए एक संभावित तस्वीर जरूर बनती है।
एक तरफ भाजपा का पुराना संगठन, पुन्नूलाल मोहले का अनुभव और 2023 की जीत।
दूसरी तरफ कांग्रेस का नया सामाजिक चेहरा, ढालदास साहेब की संभावित दावेदारी
इन दोनों के बीच तीसरा महत्वपूर्ण तत्व होगा स्थानीय कांग्रेस नेताओं की भूमिका।
यदि कांग्रेस इन तीनों को एक साथ साध लेती है तो मुकाबला बेहद दिलचस्प हो सकता है।
मुंगेली की जनता के लिए असली मुद्दे क्या होंगे?
आखिरकार चुनाव केवल जातीय और राजनीतिक समीकरणों से नहीं जीता जाता। मुंगेली के मतदाता विकास, सड़क, स्वास्थ्य, शिक्षा, रोजगार, सिंचाई, कृषि, सरकारी योजनाओं, नगरीय सुविधाओं और स्थानीय प्रशासन से जुड़े सवालों पर भी मतदान करते हैं। इसलिए 2028 में ढालदास साहेब यदि चुनाव मैदान में उतरते हैं तो उन्हें केवल सामाजिक पहचान के भरोसे नहीं रहना होगा। उन्हें अपना राजनीतिक एजेंडा भी स्पष्ट करना होगा। मुंगेली के लिए उनका विजन क्या होगा?
युवाओं के लिए रोजगार कैसे आएगा? किसानों की समस्याओं का समाधान कैसे होगा? ग्रामीण क्षेत्रों की सड़क और स्वास्थ्य व्यवस्था कैसे सुधरेगी? शहर में जल निकासी और यातायात की समस्या का समाधान क्या होगा?
शिक्षा और रोजगार के लिए क्या योजना होगी?
इन सवालों के जवाब ही उनकी राजनीतिक दावेदारी को मजबूत करेंगे।
सबसे बड़ा मुकाबला वोट का नहीं, नैरेटिव का होगा
मुंगेली की राजनीति में 2028 से पहले सबसे दिलचस्प लड़ाई शायद वोट से पहले नैरेटिव की होगी। भाजपा कह सकती है कि उसके पास अनुभव, संगठन और विकास का रिकॉर्ड है। कांग्रेस कह सकती है कि उसे बदलाव का अवसर दिया जाए।
ढालदास साहेब अपनी सामाजिक पृष्ठभूमि और जनसेवा के एजेंडे को सामने रख सकते हैं।
भाजपा उनके राजनीतिक प्रभाव को चुनौती देने के लिए अपना संगठन मैदान में उतारेगी।
कांग्रेस उनके सामाजिक प्रभाव को व्यापक वोट बैंक में बदलने की कोशिश करेगी और जनता इन दोनों दावों के बीच अपना फैसला करेगी।
अभी सिर्फ शुरुआत, असली तस्वीर 2028 में साफ होगी गुरु ढालदास साहेब का कांग्रेस में प्रवेश मुंगेली विधानसभा की राजनीति में निश्चित रूप से एक नया राजनीतिक अध्याय खोलता है। उन्होंने स्वयं मुंगेली से विधानसभा चुनाव लड़ने की इच्छा जाहिर की है, इसलिए उनकी संभावित दावेदारी को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। लेकिन इस समय उन्हें कांग्रेस का संभावित प्रत्याशी घोषित कर देना उचित नहीं होगा। टिकट का फैसला कांग्रेस नेतृत्व करेगा और उससे पहले पार्टी के भीतर कई राजनीतिक समीकरण बनेंगे। 2023 के आंकड़े बताते हैं कि मुंगेली में भाजपा के पुन्नूलाल मोहले ने कांग्रेस के संजीत बनर्जी को 11,781 वोटों से हराया था। इसलिए कांग्रेस के सामने 2028 में बड़ी चुनौती होगी भाजपा की इस बढ़त को खत्म करना।
ढालदास साहेब का सामाजिक प्रभाव कांग्रेस को शुरुआती बढ़त दिला सकता है, लेकिन इसे चुनावी जीत में बदलने के लिए संगठन, बूथ प्रबंधन, स्थानीय नेताओं की एकजुटता और गैर-सतनामी मतदाताओं का समर्थन जरूरी होगा।
वहीं भाजपा के लिए चुनौती यह होगी कि वह सतनामी समाज सहित सभी सामाजिक वर्गों में अपने समर्थन को मजबूत बनाए रखे और कांग्रेस के नए चेहरे को प्रभावी चुनौती दे।
इस पूरे घटनाक्रम की सबसे महत्वपूर्ण बात यही है कि मुंगेली की 2028 की चुनावी लड़ाई का पहला संकेत सितंबर 2026 में ही दिखाई देने लगा है। अभी चुनाव दूर है, लेकिन राजनीतिक बिसात बिछनी शुरू हो गई है।
और आने वाले समय में असली सवाल यह नहीं होगा कि ढालदास साहेब कांग्रेस में क्यों आए? बल्कि सवाल यह होगा
क्या कांग्रेस ढालदास साहेब के सामाजिक प्रभाव को मुंगेली में भाजपा के मजबूत चुनावी संगठन के मुकाबले वोट में बदल पाएगी? इसी सवाल का जवाब आने वाले दो वर्षों में मुंगेली की राजनीति की दिशा तय करेगा। फिलहाल इतना तय है कि ढालदास साहेब की कांग्रेस में एंट्री ने मुंगेली विधानसभा को 2028 के संभावित हाई-वोल्टेज मुकाबलों की सूची में जरूर ला खड़ा किया है।
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