मुंगेली । हिंदुस्तान दृष्टि । शिक्षा व्यवस्था को बेहतर बनाने और स्कूलों में शिक्षकों की नियमित उपस्थिति सुनिश्चित करने के लिए जिला प्रशासन द्वारा किए जा रहे आकस्मिक निरीक्षण निश्चित रूप से स्वागत योग्य कदम हैं। लेकिन प्राथमिक एवं माध्यमिक शाला दुल्लापुर तथा हाई स्कूल झलियापुर में सामने आई स्थिति यह सवाल भी खड़ा करती है कि आखिर सरकारी स्कूलों में शिक्षक और जिम्मेदार कर्मचारी अपनी ड्यूटी को लेकर इतने बेपरवाह कैसे हो गए कि निरीक्षण के दौरान अधिकांश स्टॉफ ही नदारद मिला? जिला शिक्षा अधिकारी के आकस्मिक निरीक्षण में दुल्लापुर स्कूल में निर्धारित स्टॉफ में से केवल दो शिक्षक उपस्थित मिले, जबकि शेष स्टॉफ अनुपस्थित था। वहीं हाई स्कूल झलियापुर में भी केवल एक शिक्षक के उपस्थित मिलने की बात सामने आई है। इससे यह अंदाजा लगाया जा सकता है कि यदि जिला शिक्षा अधिकारी स्वयं अचानक निरीक्षण के लिए नहीं पहुंचते, तो शायद यह स्थिति कागजों में सामान्य ही दिखाई देती रहती।
सबसे गंभीर सवाल तो मध्यान्ह भोजन के संचालन को लेकर है। दोनों विद्यालयों में निरीक्षण के दौरान मध्यान्ह भोजन संचालित नहीं होना पाया गया। स्कूल में शिक्षक नहीं हैं और बच्चों को मिलने वाला भोजन भी नहीं बन रहा है, तो फिर उस दिन विद्यालय में पढ़ने वाले बच्चों की स्थिति क्या रही होगी? यह केवल विभागीय लापरवाही का मामला नहीं, बल्कि सीधे तौर पर बच्चों की शिक्षा और उनके अधिकारों से जुड़ा प्रश्न है।
डीईओ ने अनुपस्थित कर्मचारियों को शोकॉज नोटिस जारी करने और एक दिवस का वेतन रोकने की कार्रवाई की है। कार्रवाई होना जरूरी है, लेकिन पत्रकार के नजरिए से सवाल यह है कि क्या केवल एक दिन का वेतन रोक देना ऐसी लापरवाही पर पर्याप्त जवाबदेही तय कर पाएगा? अगर किसी विद्यालय में अधिकांश स्टॉफ ही अनुपस्थित मिल रहा है और मध्यान्ह भोजन तक संचालित नहीं हो रहा है, तो इसके पीछे की वास्तविक वजह भी सामने आनी चाहिए।
यह भी जांच का विषय होना चाहिए कि संबंधित विद्यालयों में उपस्थिति रजिस्टर में अनुपस्थित कर्मचारियों की स्थिति क्या दर्ज थी, उनकी अनुपस्थिति स्वीकृत थी या नहीं, और यदि वे बिना अनुमति अनुपस्थित थे तो इससे पहले उनकी निगरानी किस स्तर पर की जा रही थी? क्योंकि किसी विद्यालय में ऐसी स्थिति अचानक पैदा नहीं होती। नियमित निरीक्षण और निगरानी की व्यवस्था होने के बावजूद यदि शिक्षक ड्यूटी से गायब मिलते हैं, तो जिम्मेदारी केवल अनुपस्थित शिक्षक तक सीमित नहीं रहनी चाहिए।
आकस्मिक निरीक्षण की सबसे बड़ी उपयोगिता यही है कि इससे कागजों और जमीन की हकीकत के बीच का अंतर सामने आता है। दुल्लापुर और झलियापुर में जो तस्वीर सामने आई है, वह विभाग के लिए आत्ममंथन का विषय है। जिले में ऐसे कितने और विद्यालय हैं जहां निरीक्षण के समय व्यवस्था सामान्य दिखाई देती है, लेकिन बिना सूचना पहुंचने पर वास्तविकता कुछ और निकल सकती है?
प्रशासन की कार्रवाई से यह संदेश जरूर जाना चाहिए कि सरकारी स्कूलों में बच्चों के भविष्य के साथ किसी भी तरह की लापरवाही स्वीकार नहीं की जाएगी। लेकिन कार्रवाई सिर्फ निरीक्षण के दिन तक सीमित न रहकर उसके बाद भी जारी रहनी चाहिए। जिन स्कूलों में कमियां मिली हैं, वहां दोबारा आकस्मिक निरीक्षण कर यह देखना भी जरूरी है कि व्यवस्था में वास्तव में सुधार हुआ या कार्रवाई के बाद कुछ दिनों तक ही सब कुछ ठीक रहा।
सवाल शिक्षकों के एक दिन के वेतन का नहीं, बच्चों के एक दिन के भविष्य का है। जिस दिन शिक्षक विद्यालय में नहीं पहुंचता, उस दिन सिर्फ एक कर्मचारी की अनुपस्थिति दर्ज नहीं होती, बल्कि दर्जनों बच्चों के पढ़ाई के समय का नुकसान होता है। और जिस दिन मध्यान्ह भोजन नहीं बनता, उस दिन बच्चों को मिलने वाली सुविधा भी प्रभावित होती है।
इसलिए जिला प्रशासन का आकस्मिक निरीक्षण अभियान केवल कार्रवाई तक सीमित न रहे, बल्कि लगातार निगरानी, जवाबदेही और सुधार की स्थायी व्यवस्था बने। तभी इन निरीक्षणों का वास्तविक उद्देश्य पूरा होगा और सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों को वह शिक्षा और सुविधाएं मिल सकेंगी, जिसके लिए सरकार हर वर्ष करोड़ों रुपये खर्च करती है।
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